केकड़ी, 25 जून (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य विनश्चय महाराज के सुशिष्य श्रमण मुनि प्रज्ञान सागर महाराज ने कहा कि मानव अपने अल्प सुख के लिए भोगोपभोग में लगा रहता है, जिससे उसका कल्याण नहीं हो पाता। अणुव्रतों को धारण करते हुए संयमी जीवन जीने पर ही आत्म-कल्याण संभव है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमिनाथ मन्दिर में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि अपार धन-दौलत व भोगोपभोग की सुविधाएं होने के बाद भी यदि कोई दान, धर्म, पूजा, व्रताचरण व सम्यक्त्वाचरण नहीं अपनाता, तो उसका मानव जीवन सार्थक नहीं है। हम मनस्वी प्राणी हैं, इसलिए कोई भी कार्य सोच-विचार कर करना चाहिए। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है। जीवन में कभी भी दूसरों को दुख देने वाले कार्य नहीं करने चाहिए, क्योंकि आपके कर्मों से ही आपका सुख-दुख निश्चित होता है।

क्रोध व अहंकार का बोझ पत्थरों से भी भारी: सभा में संघस्थ मुनि प्रसिद्ध सागर महाराज ने भक्तामर स्तोत्र के गुणानुवाद के अंतर्गत प्रभु आराधना की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि जीवन में कितना भी कष्ट आ जाए, लेकिन कभी भी मिथ्यात्व की क्रियाएं नहीं करनी चाहिए। क्रोध, अहंकार व ईर्ष्या का बोझ पत्थरों से भी अधिक भारी होता है। जो व्यक्ति इन विकारों को अपने मन में लेकर चलता है, वह जीवन भर थका-थका सा रहता है। मीडिया प्रभारी रमेश बंसल ने बताया कि सुबह मुनि ससंघ के सानिध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। शांतिधारा करने का सौभाग्य अशोक कुमार व ज्ञानचंद सिंहल (बघेरा वाले) ने प्राप्त किया। बंसल के अनुसार सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा शुक्रवार (26 जून) को मुनि ससंघ के सानिध्य में श्री नेमीनाथ मंदिर में आचार्य विनिश्चय सागर महाराज का 53वां अवतरण दिवस भक्ति अर्चना के साथ मनाया जाएगा।


