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चातुर्मासिक मंगल प्रवचन: विनय, त्याग और समर्पण से ही संभव है वास्तविक विकास: आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी

हैदराबाद (तेलंगाना), 05 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति जीवन में निरंतर आगे बढ़ना चाहता है। जैसे गाड़ी में आगे बढ़ने के लिए कई गियर होते हैं और पीछे जाने के लिए केवल एक, उसी प्रकार जीवन भी हमें सदैव प्रगति की प्रेरणा देता है। दिन की शुरुआत आगे बढ़ने के संकल्प के साथ होनी चाहिए। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां बाधाएं नहीं, बल्कि हमारी क्षमता को निखारने वाली परीक्षाएं हैं। कठिन परिश्रम, धैर्य व सकारात्मक दृष्टिकोण से मिलने वाली सफलता अत्यंत आनंददायी होती है।

विकास का पहला पगथिया विनय: उत्तराध्ययन सूत्र की प्रथम गाथा का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जीवन के विकास का पहला पगथिया विनय है। विनय केवल हाथ जोड़ने या सिर झुकाने मात्र का नाम नहीं, बल्कि माता-पिता, गुरुजनों, बड़ों व अपनी आत्मा के प्रति हृदय से आदर, श्रद्धा और समर्पण का भाव है। जिस हृदय में विनय जागृत हो जाता है, उसके लिए प्रगति के सभी मार्ग स्वतः सरल हो जाते हैं। अपने दीक्षा काल का संस्मरण सुनाते हुए गुरुदेव श्री ने बताया कि एक बार उनके हाथ से पात्र टूट जाने पर उनके गुरुभाई पूज्य दर्शनसागरजी महाराज ने उसका दोष स्वयं पर ले लिया था। बाद में स्वयं द्वारा भूल स्वीकारने पर गुरु महाराज ने करुणा भाव से केवल यही कहा— “आगे से ध्यान रखना।यह घटना सिखाती है कि विनय, त्याग और दूसरों की रक्षा का भाव ही वास्तविक महानता है।

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