केकड़ी, 08 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि शुभ योग से ही शुभ आचरण होता है। जैसे-जैसे धर्म कार्य के प्रति आत्म रुचि जागृत होती है, तभी आत्म बोध की प्राप्ति की जा सकती है। सच्ची श्रद्धा, आस्था एवं भक्ति व दृढ़ संकल्प से जीवन के कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में प्रवचन कर रही थी। उन्होंने कहा कि मोहनीय कर्म ऐसा कर्म है जो मोह के वशीभूत होने पर छूट पाना मुश्किल होता है। इसके छूटने पर ही धर्म मार्ग प्रशस्त हो सकता है। दूसरों में दोष देखकर निंदा करना व स्वयं की प्रशंसा सुनकर खुश होना दुख का कारण बनता है। दृष्टि सही न होने पर लोग दूसरों के गुण-दोष देखने लगते हैं। धर्म का वास्तविक स्वरूप दया, करुणा व अहिंसा है। प्रभु भक्ति व आराधना से वर्तमान जीवन के साथ आगामी भव को भी श्रेष्ठ बनाया जा सकता है।

धार्मिक अनुष्ठानों का हुआ आयोजन: धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने श्रीफल व अर्घ्य समर्पित किए। आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट का सौभाग्य राजेन्द्र कुमार, अर्पित कुमार (अजगरा परिवार) व राजकुमार, सुरेश कुमार, दिनेश कुमार (रांटा परिवार) ने प्राप्त किया। संचालन बा.ब्र. कनक दीदी व पंडित नितेश शास्त्री ने किया। मीडिया प्रभारी रमेश जैन ने बताया कि प्रातःकाल नित्य अभिषेक, शांतिधारा व जिनेन्द्र अर्चना आदि धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न हुईं। मध्याह्न में ‘गोम्मटसार जीवकांड’ ग्रन्थ का स्वाध्याय व जिज्ञासा-समाधान हुआ। संध्या समय आरती, भक्ति संगीत व ‘त्रिलोकसार’ ग्रन्थ के स्वाध्याय के साथ आनंद यात्रा आयोजित की गई। समाज के दिलीप जैन के अनुसार रविवार शाम आनंद यात्रा के समय आर्यिका सुरम्यमति माताजी द्वारा स्वाध्याय से आत्मध्यान की ओर बढ़ने के लिए ध्यान योग कराया जाएगा।


