केकड़ी, 13 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): राजस्थान में आगामी नगरीय निकाय चुनावों को लेकर लंबे समय से चल रही आरक्षण की प्रतीक्षा के बीच गुरुवार 13 अगस्त को जयपुर में हुई लॉटरी ने केकड़ी की राजनीति में अचानक गर्माहट पैदा कर दी। केकड़ी नगर पालिका अध्यक्ष का पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित होने के साथ ही शहर की सियासत में संभावित दावेदारों की गतिविधियां तेज होने लगी हैं। लंबे समय से चुनावी इंतजार में बैठे नेताओं और उनके समर्थकों के लिए यह लॉटरी एक तरह से राजनीतिक संकेत लेकर आई है। अध्यक्ष पद सामान्य होने से अब मुकाबले का दायरा किसी एक आरक्षित सामाजिक वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा। यही वजह है कि पिछले कुछ समय से अध्यक्ष पद के लिए मन ही मन तैयारी कर रहे कई नेताओं की उम्मीदें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। दूसरी ओर आरक्षित वर्ग की उम्मीदवारी को लेकर तैयारी कर रहे दावेदारों के चेहरे पर मायूसी भी नजर आ रही है।

40 वार्डों वाली पालिका में फिर बनेगा सत्ता का नया समीकरण: केकड़ी नगर पालिका में कुल 40 वार्ड हैं। वर्ष 2021 में हुए निकाय चुनाव में कांग्रेस ने 21 वार्डों में जीत दर्ज की थी, जबकि भाजपा को 17 वार्ड में जीत मिली थी तथा 2 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए थे। इस परिणाम के बाद कांग्रेस ने पालिका में बोर्ड बनाया था। उस चुनाव के बाद से शहर की स्थानीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला लगातार महत्वपूर्ण रहा है। इस बार परिस्थितियां पहले से अलग हैं। विधानसभा चुनाव में सत्ता का समीकरण बदल चुका है और अब नगर पालिका चुनाव में दोनों प्रमुख दल स्थानीय स्तर पर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने की तैयारी में जुटेंगे। अध्यक्ष पद का सामान्य होना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अब दोनों दलों के सामने ऐसे सामान्य वर्ग के नेताओं की तलाश और चयन की चुनौती होगी, जिनके व्यक्तिगत प्रभाव के साथ-साथ अलग-अलग वार्डों में संगठनात्मक पकड़ भी हो।

भाजपा की कमान विधायक शत्रुघ्न गौतम के हाथों में: केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में वर्तमान में भाजपा के विधायक शत्रुघ्न गौतम हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में गौतम ने कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा को पराजित किया था। ऐसे में आगामी नगर पालिका चुनाव भाजपा के लिए स्थानीय निकाय की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की अगली बड़ी परीक्षा होंगे। अध्यक्ष पद सामान्य होने के बाद भाजपा के भीतर भी दावेदारों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अध्यक्ष पद के लिए चेहरा तय करने की नहीं होगी, बल्कि 40 वार्डों में मजबूत प्रत्याशियों को उतारकर बोर्ड बनाने लायक संख्या हासिल करने की होगी। 2021 में भाजपा 17 वार्ड जीतकर कांग्रेस से केवल चार सीट पीछे रही थी। इसलिए इस बार पार्टी के पास पिछला प्रदर्शन सुधारने की स्पष्ट गुंजाइश दिखाई देती है।

कांग्रेस के सामने पुराने बोर्ड की साख बचाने की चुनौती: दूसरी ओर कांग्रेस के सामने अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने तथा पालिका में दोबारा बोर्ड बनाने की चुनौती होगी। 2021 में कांग्रेस ने 21 वार्ड जीतकर बहुमत का आधार तैयार किया था। निवर्तमान पालिका अध्यक्ष कमलेश साहू कांग्रेस से जुड़े हुए हैं और स्थानीय संगठन में भी पार्टी की मौजूदगी बनी हुई है। कांग्रेस की राजनीतिक कमान पूर्व मंत्री एवं पूर्व विधायक डॉ. रघु शर्मा के हाथों में है। ऐसे में पालिका चुनाव केवल पार्षद चुनने का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेस अपने संगठन की ताकत और पिछले बोर्ड के कामकाज को भी जनता के सामने लेकर जाएगी।

RLP भी बन सकती है तीसरी ताकत: केकड़ी नगर पालिका चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के बीच हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) भी तीसरे मोर्चे के रूप में समीकरण प्रभावित कर सकती है। पिछले कुछ समय से RLP की स्थानीय स्तर पर सक्रियता भी बढ़ी है और पार्टी निकाय चुनावों में मजबूती से उतरने की तैयारी में है। ऐसे में भाजपा-कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर कई स्थानीय दावेदार RLP का दामन थामकर चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। व्यक्तिगत जनाधार वाले ये प्रत्याशी दोनों प्रमुख दलों के वोटों में सेंध लगाने के साथ ही, यदि पर्याप्त पार्षद जीतकर आते हैं तो अध्यक्ष पद के चुनाव में किंगमेकर की भूमिका भी निभा सकते हैं।

रघु शर्मा बनाम शत्रुघ्न गौतम की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर: केकड़ी की राजनीति में डॉ. रघु शर्मा व शत्रुघ्न गौतम के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नई नहीं है। विधानसभा चुनावों में दोनों के बीच 2013 व 2023 में सीधा मुकाबला हो चुका है और दोनों बार गौतम ने जीत हासिल की है। अब नगर पालिका चुनाव इस राजनीतिक मुकाबले को एक बार फिर स्थानीय स्तर पर नई दिशा दे सकते हैं। अध्यक्ष पद सामान्य होने के बाद दोनों दलों के रणनीतिकारों के सामने कई सवाल होंगे:— जैसे किस चेहरे पर दांव लगाया जाए? किस नेता को संगठन और वार्डों में स्वीकार्यता हासिल है? कौन ऐसा चेहरा है जो पार्टी के भीतर गुटबाजी को कम कर सके? किस उम्मीदवार के पीछे पार्षदों का पर्याप्त समर्थन जुटाया जा सकता है? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में पार्टी बैठकों, वार्ड स्तर की गतिविधियों और संभावित दावेदारों की सक्रियता से सामने आने लगेंगे।

लॉटरी ने बदले कई नेताओं के राजनीतिक समीकरण: आरक्षण की लॉटरी से सबसे बड़ा बदलाव उन नेताओं के लिए आया है, जो लंबे समय से अपने-अपने वर्ग के आरक्षण को ध्यान में रखकर चुनावी तैयारी कर रहे थे। अध्यक्ष पद सामान्य होने से अब सामान्य वर्ग के अनेक नेताओं के लिए राजनीतिक रास्ता खुल गया है। शहर की राजनीतिक गलियों में अब संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाएं तेज होना तय है। कई नेता जो अब तक पर्दे के पीछे रहकर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय थे, वे आने वाले दिनों में सार्वजनिक रूप से अपनी सक्रियता बढ़ा सकते हैं। दूसरी ओर जिन नेताओं को किसी आरक्षित वर्ग के आधार पर अध्यक्ष पद की उम्मीद थी, उनके राजनीतिक समीकरण फिलहाल बदल गए हैं। हालांकि वार्ड पार्षद की आरक्षण लॉटरी अभी बाकी है, इसलिए उनके लिए भी पूरी तरह तस्वीर खत्म नहीं हुई है।

असली खेल अब वार्डों की लॉटरी के बाद शुरू होगा: अध्यक्ष पद की लॉटरी ने केवल पहला पत्ता खोला है। असल राजनीतिक तस्वीर वार्ड पार्षदों की लॉटरी के बाद ही साफ होगी। 40 वार्डों में कौन सा वार्ड सामान्य रहेगा, कौन सा महिला वर्ग के लिए आरक्षित होगा और किन वार्डों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण होगा—इन सभी सवालों के जवाब वार्ड आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मिलेंगे। यही आरक्षण यह तय करेगा कि कौन सा दावेदार किस वार्ड से मैदान में उतर पाएगा। इसलिए अध्यक्ष पद के दावेदारों की नजर अब वार्ड आरक्षण पर भी टिक गई है। यदि किसी संभावित अध्यक्ष पद के दावेदार का अपना वार्ड आरक्षित हो जाता है तो उसके सामने चुनाव लड़ने के लिए दूसरा वार्ड तलाशने की चुनौती खड़ी हो सकती है। वहीं सामान्य वार्ड मिलने पर उसकी दावेदारी और मजबूत हो सकती है।

पार्षदों की संख्या बनेगी अध्यक्ष की कुर्सी की असली चाबी: नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं जीता जाता। अध्यक्ष बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है—पार्षदों का पर्याप्त समर्थन। यही कारण है कि आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच केवल प्रत्याशियों के चयन की कवायद नहीं होगी, बल्कि मजबूत वार्डों की पहचान, संभावित बागियों पर नजर, निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका और चुनाव बाद बनने वाले समीकरणों पर भी रणनीति तैयार होगी। 2021 में कांग्रेस को 21, भाजपा को 17 और निर्दलीयों को 2 सीटें मिली थीं। इस बार यदि दोनों दलों के बीच मुकाबला कांटे का रहा तो निर्दलीय पार्षद एक बार फिर निर्णायक भूमिका में आ सकते हैं।

टिकट से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा ‘जीताऊ चेहरा’: इस बार राजनीतिक दलों के सामने एक और बड़ी चुनौती होगी—टिकट किसे दिया जाए? सिर्फ पार्टी के पुराने कार्यकर्ता या प्रभावशाली व्यक्ति को टिकट देना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी नेतृत्व ऐसे चेहरे तलाशेगा जो अपने वार्ड में जीत हासिल करने के साथ-साथ चुनाव के बाद बोर्ड गठन में भी उपयोगी साबित हो सकें। यही वजह है कि अध्यक्ष पद की दावेदारी रखने वाले नेताओं की नजर अब अपने संभावित समर्थक पार्षदों पर भी होगी। राजनीतिक समीकरणों में व्यक्तिगत संबंध, सामाजिक समीकरण, वार्ड में पकड़, संगठन के साथ तालमेल और चुनावी संसाधन—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

बगावत और निर्दलीयों की भूमिका भी अहम: स्थानीय निकाय चुनावों में टिकट वितरण के बाद अक्सर पार्टी के भीतर असंतोष देखने को मिलता है। केकड़ी में भी यदि किसी बड़े दावेदार को टिकट नहीं मिला तो उसके निर्दलीय मैदान में उतरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में चुनाव का परिणाम सीधे तौर पर अध्यक्ष पद के समीकरण को प्रभावित कर सकता है। खासकर तब, जब भाजपा और कांग्रेस के बीच पार्षदों की संख्या में बहुत ज्यादा अंतर न हो। इसलिए दोनों दलों के सामने टिकट वितरण से लेकर चुनाव परिणाम तक डैमेज कंट्रोल बड़ी चुनौती रहेगा।

शहर की राजनीति में शुरू होगा ‘दावेदार कौन?’ का दौर: लॉटरी के साथ ही अब केकड़ी में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की होगी कि आखिर सामान्य वर्ग से अध्यक्ष पद के लिए कौन-कौन चेहरे सामने आते हैं। हालांकि अभी किसी नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगी है, लेकिन राजनीतिक हलकों में संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाएं शुरू होना शुरू हो गई है। कुछ नेता संगठन के स्तर पर अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटेंगे तो कुछ सामाजिक और व्यक्तिगत संपर्कों के जरिए समर्थन जुटाने का प्रयास करेंगे। अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल होने वाले हर नेता के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह 40 वार्डों के राजनीतिक समीकरणों में कितनी स्वीकार्यता रखता है।

विधानसभा चुनाव के बाद नगर की राजनीति का पहला बड़ा इम्तिहान: केकड़ी में विधानसभा चुनाव के बाद यह नगर पालिका चुनाव स्थानीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। विधानसभा में भाजपा के शत्रुघ्न गौतम और कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा के बीच मुकाबले का परिणाम सामने आ चुका है, लेकिन नगर पालिका का चुनाव अलग राजनीतिक गणित लेकर आता है। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, वार्ड स्तर की पकड़, स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण कई बार पार्टी के बड़े राजनीतिक प्रभाव पर भी भारी पड़ते हैं। इसीलिए आगामी नगर पालिका चुनाव यह भी बताएंगे कि केकड़ी शहर की जमीनी राजनीति में किस दल का संगठन अधिक मजबूत है और जनता का स्थानीय मुद्दों पर रुख क्या है।

अब नजर वार्ड आरक्षण की अगली लॉटरी पर: अध्यक्ष पद के सामान्य वर्ग में आने के बाद फिलहाल राजनीतिक तस्वीर का एक बड़ा हिस्सा साफ हुआ है, लेकिन चुनावी बिसात अभी पूरी तरह नहीं बिछी है। अब सभी की नजर वार्ड पार्षदों की आरक्षण लॉटरी पर है। वार्डों का आरक्षण सामने आते ही संभावित प्रत्याशियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी और उसके बाद भाजपा-कांग्रेस में टिकट की दौड़ तेज होगी। यानी आज की लॉटरी ने केकड़ी की चुनावी राजनीति में सिर्फ दस्तक दी है। असली घमासान वार्ड आरक्षण, टिकट वितरण और उम्मीदवारों के मैदान में उतरने के बाद शुरू होगा। फिलहाल इतना तय है कि 13 अगस्त की लॉटरी ने केकड़ी की शांत पड़ी चुनावी राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। दावेदार सक्रिय हैं, पार्टियां रणनीति बनाने में जुटेंगी और शहर की राजनीतिक निगाहें अब अगली लॉटरी पर टिक गई हैं।

