केकड़ी, 18 सितंबर (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि आर्जव धर्म आत्मा का मूल स्वभाव है, जो हर प्राणी में मौजूद है व इसे पुरुषार्थ के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए परिणामों में सरलता व निर्मलता लाना अनिवार्य है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन आर्जव धर्म का महत्व बताते हुए बोल रही थी। उन्होंने कहा कि वक्रता, कुटिलता एवं मायाचार का त्याग कर सरलता व अवक्रता को अपनाना ही सच्चा आर्जव धर्म है। जिसके चित्त में राग-द्वेष और कुटिलता भरी हो, उसे आत्मदर्शन की अनुभूति नहीं हो सकती और न ही वह धर्म जगत में प्रवेश कर सकता है। अंतरंग विशुद्धि के बिना बाह्य वेश का कोई महत्त्व नहीं है। आर्जव धर्म मनुष्य का सच्चा आभूषण है, जो हृदय को स्वच्छ रखता है। सरल परिणामी जीव ही सर्वमान्य होकर रत्नत्रय धर्म का अधिकारी बनता है व परमात्मा के समीप पहुंचता है।

मायाचार समस्त दुखों का कारण: धर्म देशना के दौरान आर्यिका माताजी ने सचेत करते हुए कहा कि स्पर्शन इंद्रिय की तीव्र लोलुपता वासनाओं की पूर्ति के लिए कुटिल प्रपंचों को जन्म देती है। मायाचार ही समस्त दुखों का मूल कारण है, जिसे त्यागकर ही सुख-शांति पाई जा सकती है। आर्यिका माताजी ने जीवन प्रबंधन के सूत्र देते हुए कहा कि क्रोध में लिया गया निर्णय व जल्दबाजी में बोला गया शब्द हमेशा पश्चाताप देते हैं। जीवन में गया हुआ पैसा वापस आ सकता है, लेकिन बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। संस्कार ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। कषाय भाव वाले व्यक्ति समाज को ठग लेते हैं, अतः ऐसे मायाचारियों से बचकर रहना चाहिए। लक्ष्य हमेशा सरल व सही होना चाहिए।

ये बने सौभाग्यशाली: मीडिया प्रभारी रमेश बंसल व पारस जैन ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ सौधर्म इंद्र परिवार द्वारा आचार्यश्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट के साथ हुआ। बा.ब्र. कनक दीदी व पं. निकेत शास्त्री के निर्देशन में संगीतमय सस्वर गान के साथ दशलक्षण धर्म विधान के आर्जव धर्म की पूजन व स्थापना की गई, जिसमें सकल दिगंबर जैन समाज ने श्रद्धा-भक्ति के साथ भाग लिया। सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य टीकमचंद, विपिन कुमार, जितेश कुमार व सानिध्य मित्तल (रामथला परिवार) को प्राप्त हुआ। वहीं शांतिधारा का पुण्यार्जन विमल कुमार, चेतन कुमार, अभिषेक, मोहित, नीरज, आशीष, ऋषभ बंसल (बिसून्दनी परिवार) व भागचंद, विजय कुमार, संचित, नमित (धूंधरी परिवार) ने प्राप्त किया।

दिनभर आयोजित हुए धार्मिक कार्यक्रम: प्रातःकाल आर्यिका संघ के सान्निध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना सहित सभी दैनिक धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। मध्याह्न में आर्यिका माताजी ने स्वाध्याय के तहत उमास्वामी विरचित तत्त्वार्थ सूत्र के तीसरे अध्याय का विवेचन किया व श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। दिलीप जैन के अनुसार संध्या समय आरती, जिनाभिषेक तथा आर्यिका माताजी द्वारा आनंद यात्रा, सामायिक व प्रतिक्रमण कराया गया। इसके उपरांत अलका जैन कुहाड़ा के निर्देशन में श्री नेमिनाथ पाठशाला के बच्चों द्वारा मनमोहक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।


