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गुर्जर समाज ने निभाई अनूठी परम्परा, छांट भरकर पितरों को लगाई धूप, खीर-चूरमे का लगाया भोग

केकड़ी: छांट भरने की परम्परा का निर्वहन करते गुर्जर समाज के लोग।

केकड़ी, 31 अक्टूबर (आदित्य न्यूज नेटवर्क): दीपावली की खुशियों के बीच गुर्जर समाज ने गुरुवार को वर्षों से चली आ रही अपनी अनूठी परंपरा का निर्वहन किया। इस परंपरा के तहत दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के बाद गुर्जर समाज के लोग एक निश्चित स्थान पर तालाब में छांट (जल) भरकर अपने पितरों को तर्पण करते हैं। अन्य समाज श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों को धूप-तर्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जबकि गुर्जर समाज के लोग दीपावली के दिन जल-तर्पण करते हैं। यह परंपरा जल स्रोतों की शुद्धता बनाए रखने और समाज में भाईचारा बढ़ाने की प्रेरणा देती है।

छांट भरने के बाद खाते है खाना मोलकिया के सरपंच शैतान गुर्जर ने बताया कि समाज के लोग दीपावली की खुशियां मनाने से पहले सामूहिक रूप से तालाब के पास एकत्रित होते हैं, पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और खीर-चूरमे का भोग अर्पित करते हैं। इसके बाद ही वे भोजन ग्रहण करते हैं। दीपावली से एक दिन पहले ही इस अनुष्ठान की पूरी तैयारी कर ली जाती है, जो गुर्जर समाज की अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा है।

केकड़ी: छांट भरने की परम्परा का निर्वहन करते गुर्जर समाज के लोग।

तालाब किनारे होता है आयोजन दीपावली के दिन सुबह से छांट भरने तक समाज के लोग व्रत रखते हैं। सुबह 11 बजे तक सभी परिवार तालाब के किनारे इकट्ठा होते हैं, थालियों में फुलके, खीर और अन्य पारंपरिक भोजन साथ लाते हैं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे समाज के लोग भोग अर्पित कर पितरों का स्मरण करते हैं। इस दौरान आंधी झाड़ा की बेल लेकर लंबी कतार में तर्पण किया जाता है, और भोजन को जलचर जीवों के लिए जल में अर्पित किया जाता है।

नए बच्चे पैदा होने की खुशी में बांटते है गुड़ इस पर्व पर समाज अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही नए जन्मे बच्चों का स्वागत भी करता है। छांट भरने के बाद नवजात के आगमन की खुशी में एक-दूसरे को गुड़ बांटा जाता है। समाज के मदन गुर्जर ने बताया कि जिस तालाब से छांट भरते हैं, वहां से पवित्र जल घर लाकर छांटा जाता है। इस अनुष्ठान में नवजात बच्चों को भी शामिल किया जाता है, जहां उनका एक हाथ बैल पर रखवाया जाता है ताकि वे समृद्धि और परंपरागत संस्कारों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।

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