केकड़ी, 20 जून (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सन्मति सागर महाराज के शिष्य मुनि सुबंध सागर महाराज ने कहा कि सच्चा साधु वही होता है जो किसी भी प्रकार का परिग्रह नहीं करता। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमिनाथ मन्दिर में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर कोई किसी भी प्रकार का परिग्रह (संग्रह) रखता है, तो वह संत नहीं हो सकता। धर्मसभा के दौरान आचार्य विनश्चय महाराज के सुशिष्य श्रमण मुनि प्रज्ञान सागर महाराज ने रमणसार ग्रंथ की व्याख्या करते हुए श्रावकों को सचेत किया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति पूजन, दान व धार्मिक द्रव्य (देव-शास्त्र-गुरु के निमित्त राशि या सामग्री) का स्वयं के लिए भोग करता है, वह अगले जन्मों में लूला, लंगड़ा, बहरा, दरिद्र व नीच कुल में उत्पन्न होता है। उसे जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट व असहनीय पीड़ा भोगनी पड़ती है। इसलिए धार्मिक द्रव्य के उपयोग में अत्यधिक सावधानी रखनी चाहिए।

भक्तामर स्तोत्र व अष्ट प्रातिहार्यों की महिमा: सभा में संघस्थ मुनि प्रसिद्ध सागर महाराज ने मानतुंगाचार्य रचित भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से प्रभु के गुणानुवाद पर प्रकाश डाला। उन्होंने भगवान के ऐश्वर्य व अष्ट प्रातिहार्यों को सविस्तार उदाहरण सहित समझाते हुए कहा कि जिनेंद्र देव की दिव्य ध्वनि व वाणी को सुनकर भव्य जीव मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं व अपने कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्रातः काल जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना सहित कई मांगलिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इससे पहले मुनि सुबंध सागर महाराज ससंघ विहार करते हुए नेमीनाथ मंदिर पहुंचे। मंदिर में पहले से विराजित मुनि प्रज्ञान सागर महाराज ससंघ के साथ जब उनका अलौकिक मिलन हुआ, तो पूरा जिन मंदिर भक्तों के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा।


