केकड़ी, 21 जून (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सन्मति सागर महाराज के शिष्य मुनि सुबंध सागर महाराज ने कहा कि मानव इंद्रिय विषय भोग व इससे जनित मिलने वाले सुख को ही वास्तविक सुख मान लेता है। जबकि धर्म, दान, पुण्य व संयम रूपी धर्म को अंगीकार करते हुए आत्म साधना में लीन होने पर ही वास्तविक सुख को प्राप्त किया जा सकता है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमिनाथ मन्दिर में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। धर्मसभा के दौरान आचार्य विनश्चय महाराज के सुशिष्य श्रमण मुनि प्रज्ञान सागर महाराज ने कहा कि श्रावकों को धर्म, पूजा व दान के कार्यों में लगे रहने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनकी अनुमोदना करना महा पुण्य संचय का कारण बनता है। इसके विपरीत, जो भी धर्म, दान व पूजा के कार्यों में विघ्न उत्पन्न करता है, उसे जन्म-जन्मान्तर तक आदि-व्याधि व मानसिक-शारीरिक कष्ट सहने पड़ते हैं। जाने-अनजाने में हम जो पाप कार्य करने लग जाते हैं, उसका दुष्परिणाम हमें भुगतना ही पड़ता है।

नेक कार्य करने के लिए किया प्रेरित: संघस्थ मुनि प्रसिद्ध सागर महाराज ने मानतुंगाचार्य रचित भक्तामर स्तोत्र में श्री जिन प्रभु के गुणानुवाद पर व्याख्या की। उन्होंने बताया कि प्राणी को प्राणी मात्र के प्रति सदैव नेक कार्य करते रहना चाहिए। दुनिया में अच्छी व बड़ी-बड़ी बातें करने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उनकी बातों पर आचरण करने वाले अल्प ही होते हैं, वे महापुरुष ही हुआ करते हैं। ऐसे महापुरुष कभी भी किसी में कमी देखकर उसका हास-परिहास नहीं करते। हमें सदैव अच्छी व मधुर वाणी बोलनी चाहिए। मीडिया प्रभारी रमेश बंसल ने बताया कि मुनि ससंघ के सानिध्य में प्रातः काल जिनाभिषेक, शांति धारा व जिनेंद्र अर्चना सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं हुई। प्रथम स्वर्ण कलश से जिनेंद्र देव का अभिषेक करने का सौभाग्य भागचंद, ज्ञानचंद, जैन कुमार व विनय भगत सावर वालों ने प्राप्त किया। वहीं जिनेन्द्र देव की शांतिधारा करने का पुण्यार्जन तिलोकचंद, कमलेश कुमार व दिनेश बंसल कालेड़ा वालों को प्राप्त हुआ। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।


