हैदराबाद (तेलंगाना), 04 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य का जीवन परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके दृष्टिकोण से बनता व बिगड़ता है। संसार में सुख-दुःख, लाभ-हानि व मान-अपमान प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हैं, किंतु जो अपनी सोच बदल लेता है, वही हर कठिनाई को अवसर में परिवर्तित कर देता है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बाहरी सौंदर्य क्षणभंगुर है, जबकि श्रेष्ठ विचार ही जीवन का वास्तविक श्रृंगार हैं। जैसा मनुष्य का चिंतन होता है, वैसा ही उसका चरित्र व भविष्य निर्मित होता है। उन्होंने ईसीजी (ECG) का उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार ईसीजी की रेखा का ऊपर-नीचे होना जीवन का संकेत है व सीधी रेखा अंत का प्रतीक होती है, उसी प्रकार जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव ही जीवंतता का प्रमाण हैं। संघर्षों से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मविकास का माध्यम बनाना चाहिए।

विपरित परिस्थितियों में भी न छोड़ें संस्कार व मूल्य: आचार्य श्री ने जल का उदाहरण देते हुए कहा कि पानी स्वर्ण पात्र में हो अथवा मिट्टी के घड़े में, वह अपना स्वभाव नहीं बदलता। उसी प्रकार मनुष्य को भी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने संस्कार, संतुलन व मूल्यों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। प्रवचन के दौरान उन्होंने थॉमस एडिसन की माता के प्रेरक प्रसंग के साथ-साथ पूनिया श्रावक व मम्मण सेठ के उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि वास्तविक समृद्धि धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि संतोष, शांति व सकारात्मक चेतना में निहित है। उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि मनुष्य परिस्थितियों को बदलने के प्रयास के बजाय अपनी सोच बदल ले, तो शिकायत अवसर में, कठिनाई साधना में व जीवन आनंद में परिवर्तित हो सकता है। परिस्थितियाँ हमें नहीं तोड़तीं, बल्कि हमारा दृष्टिकोण हमें तोड़ता है। इसलिए नजरिया बदलने से जीवन अपने आप बदल जाएगा। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

