हैदराबाद (तेलंगाना), 06 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि सड़क का स्पीड ब्रेकर बाहर से दिखाई देता है, लेकिन जीवन का स्पीड ब्रेकर बाहर से नहीं आता। इसका निर्माण मनुष्य स्वयं अपनी संकीर्ण सोच, गलत दृष्टिकोण व अहंकार से करता है। यदि व्यक्ति अपनी सोच को व्यापक बनाकर यथार्थ चिंतन को जीवन में उतार ले, तो जीवन के सभी अवरोध समाप्त हो जाते हैं व विकास का मार्ग सहज हो जाता है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के विकास में सबसे बड़ा बाधक तत्व “मैं” व अहंकार है। यही भाव व्यक्ति की मुस्कान छीन लेता है, भीतर ईर्ष्या, द्वेष व कटुता को जन्म देता है

सुनाया मरीचि का प्रसंग: आचार्यश्री ने कहा कि मैं व अहंकार का भाव ही परिवार, समाज, धर्म व राष्ट्रों के विवादों का मूल कारण बनता है। अहंकार सबसे पहले व्यक्ति की प्रगति को रोकता है व अपनों के बीच दूरियां पैदा करता है। प्रवचन के दौरान भगवान महावीर के पूर्वभव मरीचि का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि तीर्थंकर बनने का भविष्य ज्ञात होने पर उनके भीतर विनम्रता के स्थान पर अहंकार जागृत हुआ, जो उनकी आध्यात्मिक प्रगति में अवरोध बना। इसी तरह बाहुबली के उदाहरण से समझाया कि हजारों वर्षों की कठोर तपस्या भी तब तक फलदायी नहीं बनी, जब तक अहंकार का अंत नहीं हुआ। जैसे ही उनके भीतर विनय व वंदना का भाव आया, उसी क्षण केवलज्ञान प्रकट हो गया।

जीवन में शांति के लिए उतारना होगा अहंकार का चश्मा: आचार्य भगवंत ने यशोविजयजी महाराज का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सच्चा संत वही है, जो अपनी छोटी-से-छोटी भूल को सहजता से स्वीकार कर अहंकार का त्याग कर दे। जीवन में शांति, प्रसन्नता व आत्मविकास के लिए अहंकार का चश्मा उतारकर यथार्थ दृष्टि अपनानी होगी। जब “मैं” समाप्त होता है, तभी आत्मा परम शांति की ओर अग्रसर होती है। कार्यक्रम में मुनि विरक्तप्रभसागर म.सा. ने जानकारी दी कि आगामी प्रवचन का विषय “सुंदर व्यवहार का निर्माण कैसे करें” रहेगा। उन्होंने सभी तपस्वियों की सुखशाता पूछते हुए श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में धर्माराधना से जुड़ने व गुरुदेव के मंगल प्रवचनों का लाभ उठाने का आग्रह किया।


