केकड़ी, 07 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि मोहनीय कर्म मनुष्य में मोह व राग-द्वेष उत्पन्न करता है, जो आत्म-कल्याण के मार्ग में बाधा है। समता भाव अपनाकर ही मनुष्य धर्म की वास्तविक प्रकृति को समझ सकता है और सच्ची श्रद्धा ही व्यक्ति को अपने दायित्व के प्रति निष्ठावान बनाती है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में प्रवचन कर रही थी। जीवन में व्यवहार ज्ञान व गुरु-भक्ति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के अहंकार पर चोट लगती है तो वह क्रोधित होकर सही निर्णय लेने की क्षमता खो देता है। परिस्थितियों चाहे कितनी भी विपरीत हों, मनुष्य को गुरु के प्रति अपनी आस्था कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

समर्पित किए श्रीफल अर्घ्य: धर्मसभा से पहले जैन समाज के श्रावकों ने श्रीफल अर्घ्य समर्पित किए। आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य शिखर चंद मुकेश कुमार चौरूका (जूनियां परिवार) एवं हीनल, प्रदीप दोशी, ईशा व मिनेश शाह (सागवाड़ा निवासी) ने प्राप्त किया। धर्मसभा का संचालन बा.ब्र. कनक दीदी व पंडित निकेत शास्त्री ने किया। मीडिया प्रभारी रमेश बंसल व पारस जैन ने बताया कि प्रातःकाल आर्यिका ससंघ के सानिध्य में जिनेंद्र अभिषेक, शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। मध्याह्न में आर्यिका माताजी द्वारा गोम्मटसार जीवकांड शास्त्र का स्वाध्याय व शंका-समाधान किया गया। शाम के सत्र में आरती, भक्ति संगीत, त्रिलोक सार ग्रंथ का वाचन, प्रश्नोत्तरी व आनंद यात्रा का आयोजन हुआ।


