हैदराबाद (तेलंगाना), 12 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि वीतराग परमात्मा महावीर की देशना का प्रत्येक सूत्र जीवन के परम आदर्श को प्रस्तुत करता है। केवलज्ञान के आलोक में परमात्मा ने जीवन, संसार के समस्त पदार्थों व उनकी पर्यायों को देखकर सत्य का साक्षात्कार कराया। उनका प्रत्येक शब्द मानव जीवन को सही दिशा देने वाला है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। जीवन की तीन अवस्थाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बचपन पढ़ाई के लिए, युवावस्था कमाई के लिए व वृद्धावस्था पुण्याई के लिए महत्वपूर्ण है। जीवन में परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उनका सामना किस दृष्टि से किया जाए, यह हमारे हाथ में है। इसका पहला सूत्र यही है कि किसी की बुराई न देखकर हमेशा दूसरों की अच्छाई देखनी चाहिए।

दूरबीन, दर्पण व कैमरे के उदाहरण से समझाया जीवन दर्शन: गुरुदेव श्री ने दूरबीन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार दूरबीन का छोटा कांच दूर की वस्तु को बड़ा करके दिखाता है, ठीक उसी तरह जब किसी में छोटी-सी अच्छाई दिखे तो उसे बड़ा करके देखना चाहिए। यदि किसी की बुराई या दुर्गुण नजर आए तो दृष्टि बदल लेनी चाहिए ताकि वह छोटी दिखाई दे। उन्होंने सीख दी कि जब किसी में बुराई दिखे तो तुरंत ‘दर्पण‘ की ओर देखकर आत्मनिरीक्षण करें कि वह दुर्गुण अपने भीतर कितना है। वहीं जब किसी में अच्छाई दिखे तो ‘कैमरे‘ की तरह उसे कैद कर अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

सुख से अधिक आत्महित को दें महत्व: आचार्य श्री ने सुख व हित के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि हर सुख हितकारी हो, यह आवश्यक नहीं। ऐसा सुख व्यर्थ है जिसका परिणाम अहितकारी हो, जबकि ऐसा दुःख भी सार्थक है जिसका परिणाम हित में हो। भगवान महावीर की देशना क्षणिक सुख के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के हित के लिए है। निर्णय लेते समय यह न सोचें कि “मुझे अच्छा क्या लग रहा है”, बल्कि यह विचार करें कि “मेरे लिए हितकारी क्या है”। क्षणिक सुख के बजाय आत्महित को महत्व देना ही जीवन जीने की सच्ची कला है।

