केकड़ी, 13 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि मनुष्य सांसारिक चक्र में इधर-उधर भटक रहा है, जबकि उसे भटकने की आवश्यकता नहीं है। अपने मन रूपी मंदिर में एकाग्र होकर ध्यान करने से जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में प्रवचन कर रही थी। उन्होंने कहा कि परिवार संसार रूपी जल में चलने वाली नाव के समान है। सांसारिक नाते-रिश्तों को ही जीवन का अंतिम सत्य मान लेना भ्रम है। जो अपने होते हैं, वे मरघट तक ही साथ रहते हैं, जबकि आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है। इसलिए आत्मा के स्वरूप का चिंतन और आराधना ही जीवन की सच्ची साधना है। उन्होंने कहा कि उत्तम श्रोता ही गुरु वचन और जिनवाणी को सही अर्थों में ग्रहण कर सकता है। जिनवाणी के श्रवण से मन और हृदय को कोमल बनाया जा सकता है।

विनयता से आती है बुद्धिमत्ता: आर्यिका माताजी ने श्रावकों से सत्य रूपी धर्म का पालन करने का आह्वान करते हुए कहा कि सत्य से पुण्य और मान-सम्मान बना रहता है, जबकि असत्य को छिपाने के लिए अनेक झूठ बोलने पड़ते हैं। इसलिए असत्य से बचना चाहिए। उन्होंने विनय भाव को जीवन का महत्वपूर्ण गुण बताते हुए कहा कि विनयता से बुद्धिमत्ता आती है तथा पारिवारिक वातावरण में प्रसन्नता और शांति बनी रहती है। उन्होंने कहा कि मन, वचन और काय से किसी भी त्रस जीव को मारने का भाव नहीं रखना चाहिए। कृत, कारित और अनुमोदना से भी हिंसा से बचते हुए प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखना चाहिए। धर्मसभा का संचालन बाल ब्रह्मचारिणी कनक दीदी एवं पंडित निकेत शास्त्री किया।

दिनभर धर्ममय रहा वातावरण: मीडिया प्रभारी रमेश बंसल ने बताया कि आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य भागचंद, विजय कुमार, संचित, नमित जैन धून्धरी परिवार ने प्राप्त किया। दिलीप जैन ने बताया कि प्रातः आर्यिका ससंघ के सानिध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा, जिनेन्द्र अर्चना सहित दैनिक धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न हुईं। मध्यान्ह में आर्यिका सुरम्यमति माताजी द्वारा श्रावकों को गोम्मटसार जीवकांड शास्त्र का स्वाध्याय कराया गया तथा जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। शाम को आरती, भक्ति संगीत एवं आर्यिका माताजी द्वारा तिलोयपण्णत्ती ग्रन्थ का स्वाध्याय हुआ, जिससे वातावरण धर्ममय बना रहा।

