हैदराबाद (तेलंगाना), 13 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य जीवन में जो भी कार्य करता है—चाहे वह बोलना हो, सोचना हो, भोजन करना हो या व्यापार—उसके पीछे कोई न कोई लक्ष्य होता है। लेकिन हमें समय-समय पर यह विचार भी करना चाहिए कि जीवन की सीमित अवधि समाप्त होने से पहले हम वास्तव में क्या प्राप्त करना चाहते हैं। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमें अनमोल सांसें, शरीर, बुद्धि, क्षमता और योग्यताएं मिली हैं। सवाल यह है कि इनका हम अधिकतम सदुपयोग कर रहे हैं या केवल औपचारिक रूप से जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यदि अनमोल सांसों के बदले केवल धन, संपत्ति, यश और सम्मान ही अर्जित किया तो यह घाटे का सौदा है। इन्हीं सांसों का सदुपयोग करके परम शांति और आत्मिक समाधि प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर एक सूत्र दृढ़ता से स्थापित कर लेना चाहिए—“मेरा जीवन परिणामलक्षी होना चाहिए।” कोई भी कार्य करने, बोलने या निर्णय लेने से पहले उसके परिणाम पर विचार करना चाहिए।

हर निर्णय से पहले परिणाम पर करें विचार: गुरुदेव ने कहा कि पहले परिणाम को देखो, फिर बोलो, सोचो और उसके बाद कदम आगे बढ़ाओ। यह भी विचार करें कि हमारे व्यवहार से आत्मा पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इससे कर्मबंधन होगा या कर्मों की निर्जरा—यह चिंतन जीवन के प्रत्येक निर्णय का हिस्सा होना चाहिए। आचार्यश्री ने विपरीत परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में परिस्थितियां हमेशा हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होतीं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के सामने प्रतिकार, स्वीकार और सत्कार—तीन विकल्प होते हैं। प्रतिकार यानी परिस्थिति का विरोध कर संघर्ष करना, स्वीकार यानी मन में पीड़ा और शिकायत रखते हुए उसे मजबूरी में मान लेना, जबकि सत्कार का अर्थ है विपरीत परिस्थिति को भी आदरपूर्वक स्वीकार करते हुए उसमें छिपी सीख, अवसर और आत्म-विकास के मार्ग को पहचानना। उन्होंने भगवान महावीर के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके जीवन में भी अनेक विपरीत परिस्थितियां आईं, लेकिन उन्होंने उनका प्रतिकार नहीं किया, बल्कि उनका सत्कार किया। इसलिए महत्वपूर्ण यह नहीं है कि परिस्थिति कैसी आएगी, बल्कि यह है कि परिस्थिति आने पर हमारी दृष्टि कैसी होगी।

जिंदगी क्रिकेट की तरह, हर गेंद खेलनी होगी: जीवन को क्रिकेट से जोड़ते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जिंदगी भी क्रिकेट के खेल जैसी है। हर गेंद हमारी पसंद की नहीं आती, लेकिन हर गेंद खेलनी पड़ती है। हर गेंद पर चौका या छक्का लगाना जरूरी नहीं, बल्कि क्रीज पर टिके रहना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जीवन में कभी सुख आएगा तो कभी दुःख, कभी सफलता मिलेगी तो कभी असफलता। हमें प्रत्येक परिस्थिति को धैर्य, सावधानी और संतुलन के साथ स्वीकार करते हुए जीवन की क्रीज पर टिके रहना है। आचार्यश्री ने कहा कि परिणाम को ध्यान में रखकर किया गया प्रत्येक विचार, वाणी और व्यवहार जीवन को सही दिशा देता है। परिणामलक्षी जीवन वह है जिसमें व्यक्ति केवल यह नहीं देखता कि अभी क्या अच्छा लग रहा है, बल्कि यह भी देखता है कि इसका परिणाम मेरी आत्मा के लिए क्या होगा। यही दृष्टि जीवन को सार्थक बनाती है और यही जीवन जीने की सच्ची कला है।

