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सात साल पुराने मनीष चौधरी हत्याकांड में बड़ा फैसला: अफीम खिलाकर हत्या के दोषी को उम्रकैद, 2 लाख रुपए जुर्माना

केकड़ी, 25 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): करीब सात साल पुराने बहुचर्चित मनीष चौधरी मौत प्रकरण में केकड़ी की विशिष्ट न्यायाधीश, एनडीपीएस केस एवं अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश संख्या-1 जयमाला पानीगर की अदालत ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी रामधन जाट पुत्र पोलूराम निवासी अजगरा को हत्या एवं एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषसिद्ध कर दिया। न्यायालय ने उसे धारा 302 भारतीय दंड संहिता के तहत आजीवन कठोर कारावास तथा एक लाख रुपए अर्थदंड से दंडित किया है। न्यायालय ने इसके साथ ही धारा 8/18(सी) एनडीपीएस एक्ट के तहत पांच वर्ष का कठोर कारावास और 50 हजार रुपए जुर्माना तथा धारा 8/29 एनडीपीएस एक्ट के तहत पांच वर्ष का कठोर कारावास और 50 हजार रुपए जुर्माना भी सुनाया है। दोनों एनडीपीएस धाराओं में छह-छह माह के अतिरिक्त कठोर कारावास का भी उल्लेख दंडादेश में किया गया है।

सात साल पुराने मामले में आया फैसला: प्रकरण के तथ्यों के अनुसार 12 फरवरी 2019 को राममालिया स्थित तिरूपति माइंस पर मनीष चौधरी के जाने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई थी। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी रामधन ने मनीष को अफीम खिलाई और अपने पास भी मादक पदार्थ रखा। अगले दिन मनीष की तबीयत गंभीर होने पर उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। इसके बाद पुलिस थाना केकड़ी में मामला दर्ज कर अनुसंधान शुरू किया गया था। पुलिस अनुसंधान के बाद रामधन के खिलाफ धारा 302 भादंसं तथा धारा 8/18 और 8/29 एनडीपीएस एक्ट में आरोप पत्र पेश किया गया था। मामले की सुनवाई सेशन न्यायालय में हुई।

गवाहों की गवाही और बरामदगी बनी अहम कड़ी: अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ कुल 23 गवाहों की साक्ष्य और 37 दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए। सजा के प्रश्न पर बचाव पक्ष ने आरोपी के वर्ष 2019 से मुकदमे का सामना करने और पूर्व में किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्ध नहीं होने के आधार पर नरमी की मांग की। वहीं अपर लोक अभियोजक मोहिन्दर जोशी ने विभिन्न तर्क प्रस्तुत करते हुए आरोपी को कठोर दंड देने की मांग की। अदालत ने माना कि आरोपी ने ऐसे व्यक्ति को, जिसे विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा नशा करने से मना किया गया था, यह जानते हुए भी अफीम खिलाई कि इससे उसकी मृत्यु हो सकती है। न्यायालय ने अपराध को गंभीर प्रकृति का मानते हुए कहा कि केवल मुकदमे के करीब सात वर्ष लंबित रहने के आधार पर आरोपी सजा में नरमी का हकदार नहीं है।

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