केकड़ी, 13 सितंबर (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि साधु-संत चलते-फिरते तीर्थ और बहते पानी के समान होते हैं, जो अपने उपदेशों से प्राणी मात्र को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इंसान के जीवन में दुख आने पर ही अपने और पराए की सही पहचान होती है। क्रोध से हमेशा बचना चाहिए, क्योंकि यह दूसरों से ज्यादा स्वयं के लिए हानिकारक होता है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में प्रवचन कर रही थी। उन्होंने कहा कि बारिश की छोटी-छोटी बूंदें लगातार बरसने पर नदी का रूप ले लेती हैं, ठीक उसी तरह जीवन में छोटे-छोटे प्रयास, संयम और त्याग से बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अन्याय, छल-कपट व मायाचारी से कमाए धन का दिखावा करना घोर विपत्ति का कारण बनता है, जबकि नेकी और ईमानदारी की कमाई ही जीवन में फलदायी होती है। सच्चा सुख केवल धन में नहीं, बल्कि भाईचारे और संतोष में है। धर्मसभा का संचालन बा. ब्र. कनक दीदी व पंडित निकेत शास्त्री ने किया।

धार्मिक क्रियाएं व ग्रंथ स्वाध्याय: प्रातः काल आर्यिका संघ के सानिध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना आदि धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुई। मीडिया प्रभारी रमेश जैन व पारस जैन ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य राजेश कुमार, कमलेश कुमार व रमेश कुमार मनोहरपुरा परिवार को प्राप्त हुआ। मध्याह्न में आर्यिका माताजी द्वारा ‘गोम्मटसार जीवकांड‘ ग्रंथ का स्वाध्याय एवं श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। शाम के समय आरती, भक्ति संगीत और आत्म-ध्यान शिविर का आयोजन हुआ। दिलीप जैन के अनुसार सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा चौबीसी युक्त त्रैलोक्य ‘रोट तीज‘ व्रत के अवसर पर रोट व खीर बनाकर पर्व मनाया गया। इस मौके पर आर्यिका माताजी ने रोट तीज व्रत कथा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि इस व्रत को नियमपूर्वक करने से धन-लक्ष्मी व पुण्य की प्राप्ति होती है।


