केकड़ी, 14 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि नकारात्मक सोच से हटकर सकारात्मक सोच के द्वारा अपना भाग्य बदलने के लिए स्वयं को पुरुषार्थ करना होगा। समय का सही सदुपयोग समय पर ही कर लेना चाहिए। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में ‘आचार्य वसुनंदी श्रावकाचार‘ ग्रंथ के माध्यम से श्रावकों के आचार-विचार पर प्रवचन कर रही थी। उन्होंने कहा कि हम जिनेन्द्र देव की पूजा-आराधना तो कर लेते हैं, लेकिन सही क्रिया के अभाव में पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। जिनवाणी सुनने व स्वाध्याय करने पर ही इसे समझा जा सकता है। किसी भी शुभ कार्य को निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए मंगलाचरण अवश्य करना चाहिए।

ईर्ष्या भाव का करना होगा त्याग: आर्यिका माताजी ने कहा कि प्राणी मात्र के प्रति राग-द्वेष व ईर्ष्या त्यागकर समता भाव धारण करते हुए आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। अहंकार व अधर्म मानव जीवन के सबसे बड़े शत्रु हैं। आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करने व परिमाण करने से परिग्रह से बचा जा सकता है। ऐसे वचन कभी नहीं बोलने चाहिए जिससे धर्म, धर्मात्मा या किसी जीव के प्राणों का घात हो। प्रातःकाल आर्यिका ससंघ के सानिध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेन्द्र अर्चना सहित दैनिक धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। धर्मसभा का संचालन बाल ब्रह्मचारिणी कनक दीदी व पं. निकेत शास्त्री ने किया।

ये बने सौभाग्यशाली: मीडिया प्रभारी रमेश बंसल ने बताया कि धर्मसभा की शुरूआत में दिगंबर जैन समाज के श्रावकों ने आचार्यों को श्रीफल व अर्घ्य समर्पित किए। आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य घीसालाल, कैलाशचंद, कंवरपाल, अशोक कुमार, ज्ञानचंद, विशाल बंसल मेहरूकलां परिवार व आनंद आहार समूह को प्राप्त हुआ। दिलीप जैन ने बताया कि संध्या समय आरती, भक्ति संगीत तथा आर्यिका माताजी द्वारा ‘त्रिलोक सार‘ ग्रंथ के माध्यम से स्वाध्याय व धार्मिक आनंद यात्रा का आयोजन हुआ।


