केकड़ी, 09 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि देव, शास्त्र व गुरु की छत्रछाया में रहकर ही धर्म का वास्तविक मर्म समझा जा सकता है। मानव को हमेशा संयमित भोजन करना चाहिए, जिससे कार्य के प्रति आलस्य न आए और शरीर रोगमुक्त रहे। धर्मसभा में दान के लिए बोली गई राशि तुरंत दे देनी चाहिए, ताकि निर्माल्य के दोष से बचा जा सके; समय पर दान न देने से मन में लोभ-कषाय की भावना जागृत हो जाती है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में प्रवचन कर रही थी। उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र व गुरु के समक्ष लिए गए नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। यदि नियम पालन की क्षमता न हो तो झूठा नियम नहीं लेना चाहिए, और यदि नियम लिया है तो उसे कभी भंग नहीं करना चाहिए। जीवन में खुशहाली व मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए आवश्यक षट्कर्मों का पालन जरूरी है। मानव पंच-इंद्रियों के वशीभूत होकर अपना पतन कर लेता है, इसलिए अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए अनुकूल परिस्थितियों में हर्ष व प्रतिकूलता में विषाद से बचना चाहिए।

धार्मिक क्रियाओं का आयोजन: इससे पूर्व प्रातःकाल आर्यिका ससंघ के सानिध्य में शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। धर्मसभा के दौरान नेमिनाथ भगवान की प्रथम शांतिधारा का सौभाग्य रतनलाल, पारस कुमार व अक्षांश जैन (नासिरदा परिवार) ने प्राप्त किया। वहीं आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट का सौभाग्य जीतमल, मुकेश कुमार (कादेड़ा परिवार) एवं सुजान मल, नवीन कुमार, नवनीत चौधरी (जूनियां परिवार) को मिला। धर्मसभा का संचालन बाल ब्रह्मचारिणी कनक दीदी व पंडित निकेत शास्त्री ने किया। मीडिया प्रभारी पारस जैन व रमेश बंसल ने बताया कि मध्याह्न में माताजी द्वारा गोम्मटसार जीवकांड ग्रंथ का स्वाध्याय करवाया गया व श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। समाज के अध्यक्ष ज्ञान चंद जैन (ज्वैलर्स) व मंत्री कैलाश जैन (मावा वाले) ने बताया कि संध्या समय आरती, भक्ति संगीत, त्रिलोकसार ग्रंथ का स्वाध्याय, आनंद यात्रा तथा आर्यिका माताजी के सानिध्य में ‘आत्म-अनुभूति आत्म-ज्ञान शिविर‘ के अंतर्गत ध्यान कार्यक्रम आयोजित हुआ।


