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नेपाल की ग्लेशियर त्रासदी से सबक ले दुनिया, प्रकृति के संतुलन से खिलवाड़ पड़ सकता है भारी: आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी

हैदराबाद (तेलंगाना), 29 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि प्रकृति जब चेतावनी देती है तो उसकी आवाज हमेशा सुनाई नहीं देती, लेकिन उसके संकेत स्पष्ट होते हैं। नेपाल में ग्लेशियर के पिघलकर ऊंचाई से गिरने और उससे हुई तबाही को महज प्राकृतिक घटना मानकर आगे बढ़ जाना बड़ी भूल होगी। पहाड़ों पर जमा बर्फ का इस तरह कमजोर होना रातोंरात नहीं हुआ। बदलता मौसम, बढ़ता तापमान और प्रकृति के साथ मनुष्य का लगातार बढ़ता हस्तक्षेप इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज दुनिया विकास की दौड़ में इतनी तेजी से आगे बढ़ना चाहती है कि उसने यह विचार करना कम कर दिया है कि इस विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है। जंगलों की कटाई, पहाड़ों का अंधाधुंध दोहन, नदियों के प्राकृतिक मार्गों से छेड़छाड़ और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि कारखानों, वाहनों और ऊर्जा के बढ़ते उपयोग से वातावरण में गर्मी बढ़ रही है। इसके साथ ही युद्धों में इस्तेमाल होने वाला भारी मात्रा में बारूद और विस्फोट भी पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में उपस्थित साध्वी मंडल।

प्रकृति को समाप्त करके विकास नहीं: गुरुदेव ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि विकास चाहिए या नहीं। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास नहीं होना चाहिए, जो प्रकृति को समाप्त करके हासिल किया जाए। यदि मनुष्य प्रकृति को केवल संसाधन मानकर उसकी सहनशक्ति की सीमा की अनदेखी करता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आवश्यकता के अनुसार हो, लालच के अनुसार नहीं, यही संतुलित जीवन की दिशा है। आचार्यश्री ने कहा कि नेपाल की घटना यह याद दिलाती है कि पहाड़ों पर होने वाला पर्यावरणीय परिवर्तन केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। ग्लेशियर पिघलने से नदियों का स्वरूप बदल सकता है, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं तथा निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी भी इसकी चपेट में आ सकती है। उन्होंने कहा कि प्रकृति का संतुलन किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक रूप से पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकता है।

आज डरने की नहीं, संभलने की जरूरत: आचार्यश्री ने कहा कि आज आवश्यकता डरने की नहीं, बल्कि संभलने की है। दुनिया को युद्धों से होने वाली विनाशलीला के साथ-साथ प्रकृति के विरुद्ध चल रही निरंतर लड़ाई को भी गंभीरता से लेना होगा। विकास की दिशा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों का विषय न रहकर नीति, व्यवस्था और दैनिक जीवन का हिस्सा बने। उन्होंने कहा कि प्रकृति बदला नहीं लेती, वह केवल अपना संतुलन पुनः स्थापित करती है। जब उसका संतुलन बिगड़ता है तो मनुष्य की सारी ताकत, तकनीक और संपत्ति भी उसके सामने छोटी पड़ जाती है। आचार्यश्री ने कहा कि नेपाल की त्रासदी को केवल एक खबर मानकर भूल जाना आसान है, लेकिन इसे चेतावनी समझकर अपनी दिशा बदलना ही सच्ची समझदारी है। यदि समय रहते मनुष्य नहीं संभला तो आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के सामने उसकी बेबसी केवल देखने तक सीमित रह सकती है।

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