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“मां ही महोत्सव” विषय पर आचार्यश्री ने दिया भावपूर्ण उद्बोधन: बोले- मां के चरणों में जीवन का सबसे बड़ा तीर्थ, माता-पिता की सेवा सच्ची कृतज्ञता

हैदराबाद (तेलंगाना), 02 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि इस संसार में यदि कोई सबसे मधुर शब्द है जो सम्पूर्ण सृष्टि को आंदोलित कर दे, तो वह केवल “मां” है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि आंखें बंद कर अपनी परम उपकारी मां का स्मरण करें व उनके चरणों में कृतज्ञता अर्पित करें। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में “मां ही महोत्सव” विषय पर भावपूर्ण उद्बोधन देते हुए बोल रहे थे।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में मौजूद साध्वी मंडल।

श्रवण कुमार से प्रेरणा लेने के लिए किया प्रेरित: आचार्यश्री ने कहा कि संसार में मृत्यु के अनेक मार्ग हो सकते हैं, किन्तु जन्म का मार्ग केवल मां है। तीर्थंकर, गणधर अथवा महापुरुषप्रत्येक महान आत्मा ने प्रथम स्पर्श, वात्सल्य व पोषण मां की गोद में ही प्राप्त किया है। श्रवण कुमार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि श्रवण कुमार न बन सकें, तो कम से कम जीवन में कभी माता-पिता को दुःख न देने का संकल्प अवश्य लें।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में मौजूद महिला-पुरूष।

संस्कारों की पाठशाला है संयुक्त परिवार: आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि माता-पिता को केवल धन भेज देना या नौकरों के भरोसे छोड़ देना सेवा नहीं है। उनके पास बैठना, प्रेमपूर्वक संवाद करना व अपने हाथों से सेवा करना ही वास्तविक कृतज्ञता है। विशेष रूप से युवाओं व बहुओं से आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि कभी भी मां और बेटे को अलग करने का प्रयास न करें। संयुक्त परिवार संस्कारों की पाठशाला है, जहाँ प्रेम, त्याग व मर्यादा की शिक्षा प्राप्त होती है।

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