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दृष्टि सही हो तो कांटों के बीच भी दिखाई देता है फूल, सुख संपत्ति में नहीं बल्कि दृष्टिकोण में है: खरतरगच्छाधिपति

हैदराबाद (तेलंगाना), 10 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि केवल सांसें लेना, खाना-पीना और दैनिक क्रियाएं करना ही जीवन नहीं है, बल्कि जिंदगी एक परीक्षा, उपहार व परिणाम है। इस परीक्षा में हम स्वयं ही विद्यार्थी हैं, स्वयं ही प्रश्नपत्र बनाने वाले और अपनी उत्तरपुस्तिका जांचने वाले हैं। तीर्थंकरों और ऋषि-मुनियों ने भौतिक साधनों के अभाव में भी परम सुख का अनुभव किया, जिससे स्पष्ट है कि सुख संपत्ति में नहीं, बल्कि जीवन को देखने के दृष्टिकोण में निहित है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में जीवन जीने की कला विषय पर आयोजित धर्मसभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे।

दृष्टि बदलो, जिंदगी बदल जाएगी: आचार्यश्री ने कहा कि गुलाब के साथ कांटे भी होते हैं, लेकिन परिस्थिति को देखने की दृष्टि हर व्यक्ति की अलग होती है। आधा गिलास पानी किसी को खाली तो किसी को भरा दिखाई देता है। जीवन में दुःख के निमित्त सभी को मिलते हैं, लेकिन जो विपरीत परिस्थितियों में भी भीतर से संतुलित रहता है, वही सच्चा साधक है। आचार्य श्री ने जैसे को तैसाके बजाय सकारात्मक व्यवहार अपनाने पर जोर दिया और गांधीजी के तीन बंदरों का उदाहरण देते हुए बुराई को अनदेखा करने, न सुनने और मौन रहने की सीख दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिस्थितियां नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि जिंदगी तय करती है। प्रवचन के पश्चात् मुनि विरक्तप्रभसागर महाराज ने सभी तपस्वियों की सुखशाता पूछी और जानकारी दी कि अगले दिन के प्रवचन का विषय भी जीवन जीने की कलाही रहेगा।

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