हैदराबाद (तेलंगाना), 11 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि यह जिंदगी अनमोल है, हमारी सांसें अनमोल हैं और हमारी आंखें भी अनमोल हैं। हमें ऐसा मानव भव मिला है, जिसमें पंचेंद्रिय जीवन के साथ बुद्धि, प्रतिभा, योग्यता और कुछ करने की क्षमता प्राप्त हुई है। इसलिए इस जीवन की सार्थकता को समझना और इसे सही दिशा देना आवश्यक है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने चंदन व कोयले का उदाहरण देते हुए कहा कि हाथ में काला कोयला रखना भी हमारे हाथ में है व चंदन का टुकड़ा रखना भी। जिंदगी को कोयले जैसी काली बनाना चाहते हैं या चंदन जैसी सुगंधित, इसका निर्णय स्वयं करना है। परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना है, यह हमारे अपने हाथों में है।

बदलनी होगी दृष्टि: गुरूदेव ने कहा कि यदि जीवन को कलात्मक बनाना चाहते हैं, आर्ट ऑफ लिविंग सीखना चाहते हैं तथा जीवन को मधुर व आनंदमय बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपनी दृष्टि व मन को बदलना होगा। निगाह कभी दूसरों की बुराई की ओर नहीं जानी चाहिए। आंखों, वाणी व कानों पर चौकीदार होना चाहिए, जिसका सबसे बड़ा पहरेदार विवेक है। विवेक को आँखों, वाणी व कानों पर बिठाकर रखना जरूरी है। गुरुदेव श्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि अप्रिय प्रसंगों को जीवनभर याद नहीं रखना चाहिए। अप्रिय घटना को मिट्टी पर लिखे शब्दों की तरह छोड़ देना चाहिए।

व्यवहार में भरना होगा माधुर्य: आचार्यश्री ने कहा कि अच्छी घटनाओं व दूसरों के अच्छे व्यवहार को पत्थर की लकीर की तरह हृदय में संजोकर रखना चाहिए। इससे जीवन में कटुता के स्थान पर मधुरता व नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मकता का भाव विकसित होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में सदैव सकारात्मक व माधुर्यपूर्ण दृष्टिकोण रखना चाहिए। यदि चाहते हैं कि जीवन माधुर्य रस से परिपूर्ण हो, तो अपने विचारों, वाणी व व्यवहार में भी माधुर्य भरना होगा। जिस प्रकार चंदन स्वयं सुगंधित रहता है व अपने आसपास के वातावरण को भी सुगंधित करता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन को ऐसा बनाना चाहिए कि उसके विचार व व्यवहार आसपास के वातावरण में सकारात्मकता व मधुरता का संचार करें।

