Homeसमाज‘बेटी, जरा संभलकर’: जीवन में लक्ष्मण रेखा जरूरी, संस्कार और संवाद से...

‘बेटी, जरा संभलकर’: जीवन में लक्ष्मण रेखा जरूरी, संस्कार और संवाद से सुरक्षित होगा भविष्य—आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी

हैदराबाद (तेलंगाना), 16 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि बेटियां और बेटे समान हैं, लेकिन बेटियों के संदर्भ में कुछ विशेष सावधानियों पर विचार करना आवश्यक है। परिवार की पवित्रता, संबंधों की गरिमा और घर की शांति जिन मूल्यों पर टिकी है, उन पर आज गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बेटियों सहित सभी युवाओं को अपनी मर्यादा स्वयं निर्धारित करने, संयम और संस्कारों को जीवन का आधार बनाने तथा अपने सम्मान, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए।

जीवन में ब्रेक सिस्टम भी जरूरी: आचार्यश्री ने जीवन को वाहन से जोड़ते हुए कहा कि गाड़ी में स्टेयरिंग, गियर और एक्सीलेटर जरूरी हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उसका ब्रेक सिस्टम है। एक्सीलेटर गति देता है, जबकि ब्रेक उस गति को नियंत्रित कर सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इसी प्रकार जीवन में आगे बढ़ने की गति के साथ मर्यादा और संयम भी जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि रेड सिग्नल हमें रोकता जरूर है, लेकिन वही हमारी सुरक्षा भी करता है। उन्होंने कहा कि जीवन में लक्ष्मण रेखा जरूरी है। रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि रावण मायावी रूप धारण कर आया था। आज भी जीवन में अनेक प्रकार के मायावी आकर्षण अलग-अलग रूपों में सामने आते हैं। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर युवाओं को अपनी मर्यादा की सीमा स्वयं निर्धारित करनी चाहिए और यह समझना चाहिए कि कौन-सी सीमा उनके सम्मान, सुरक्षा और संस्कारों की रक्षा करती है।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में मौजूद पुरूष वर्ग।

माता-पिता की डांट भी कई बार सुरक्षा कवच: आचार्यश्री ने कहा कि माता-पिता की डांट कई बार बच्चों को पतन से बचाने वाली होती है। उन्होंने कहा, “जिनसे भय लगता है, उनसे प्रेम मत करो, लेकिन जिनसे प्रेम करते हो, उनसे अवश्य भय करो।उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भय किसी व्यक्ति या संबंध का नहीं, बल्कि गलत कार्य से रोकने वाली मर्यादा का भय होना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों को संदेश देते हुए कहा कि बच्चों को केवल धन और सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें समय, प्रेम, अपनापन, संवाद और संस्कार भी चाहिए। परिवार में बच्चों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जहां वे बिना संकोच अपने मन की बात माता-पिता से साझा कर सकें।

13 से 18 वर्ष की उम्र बेहद संवेदनशील: आचार्यश्री ने कहा कि 13 से 18 वर्ष की उम्र बच्चों के जीवन का अत्यंत संवेदनशील चरण होता है। इस दौरान माता-पिता को केवल बच्चों पर नियंत्रण रखने के बजाय उनका मित्र बनने का प्रयास करना चाहिए। उनकी भावनाओं को समझना और उनके साथ खुलकर संवाद करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब बच्चों को अपने मन की बात घर में कहने का विश्वास मिलता है, तो वे बाहरी आकर्षणों और गलत संगति से स्वयं को अधिक सुरक्षित रख पाते हैं। इसलिए अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार में बदलाव को समझने और समय रहते उनसे संवाद करने की आवश्यकता है।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में मौजूद महिलाएं।

मोबाइल नहीं, उसके इस्तेमाल की मर्यादा जरूरी: बदलते सामाजिक वातावरण और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव पर आचार्यश्री ने कहा कि मोबाइल आज जीवन की आवश्यकता बन चुका है, लेकिन उसके उपयोग की मर्यादा तय करना भी उतना ही जरूरी है। घर में ऐसा विश्वास और संस्कार होना चाहिए कि माता-पिता जब चाहें, बच्चे बिना किसी संकोच के अपना मोबाइल उन्हें दे सकें। उन्होंने कहा कि आवश्यकता मोबाइल को पूरी तरह छोड़ने की नहीं, बल्कि मोबाइल के उपयोग की अपनी लक्ष्मण रेखा तय करने की है। यदि संस्कार और संकल्प मजबूत हों तो बाहरी वातावरण व्यक्ति को उसकी दिशा से विचलित नहीं कर सकता।

RELATED ARTICLES