Homeसमाजसाधर्मिकों की सेवा और सहयोग ही सच्चा धर्म: आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

साधर्मिकों की सेवा और सहयोग ही सच्चा धर्म: आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

हैदराबाद (तेलंगाना), 21 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि साधु जीवन एकाकी भाव का जीवन है, जबकि गृहस्थ जीवन साथ और सामूहिकता का जीवन है। समाज में रहते हुए गृहस्थ के अपने साधर्मिक बंधुओं के प्रति विशेष दायित्व होते हैं। पांचों उंगलियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार अलग-अलग आकार और कार्य होने के बावजूद आवश्यकता पड़ने पर उंगलियाँ एक-दूसरे का सहयोग करती हैं, ठीक उसी तरह समाज को भी परस्पर सहयोग, विश्वास और अपनत्व के साथ आगे बढ़ना चाहिए। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि साधर्मिक का अर्थ केवल समान जाति या कुल का व्यक्ति नहीं, बल्कि वह है जिसका धर्म एक हो। जिसका संबंध परमात्मा से है, उससे हमारा भी अटूट संबंध है। खून का रिश्ता केवल एक भव तक सीमित रहता है, जबकि धर्म का रिश्ता भव-भव तक चलता है। इसलिए साधर्मिक की सेवा, भक्ति और सहायता करना हर श्रावक का मुख्य दायित्व है।

सेठ सवाईचंद व सोमचंद के प्रसंग से समझाया साधर्मिक वात्सल्य: प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने सेठ सवाईचंद और सेठ सोमचंद का प्रेरक प्रसंग सुनाया। संकट के समय केवल “जय केसरियानाथजी” लिखे होने पर एक लाख रुपए की हुंडी चुका देने के उदाहरण से उन्होंने बताया कि सच्चा साधर्मिक वात्सल्य वही है, जहां कागजों से अधिक विश्वास और लेन-देन से अधिक अपनत्व महत्वपूर्ण होता है। आचार्य श्री ने कहा कि मंदिर, दादाबाड़ी, धर्मशाला और भोजनशाला का निर्माण आवश्यक है, लेकिन किसी जरूरतमंद साधर्मिक की सेवा करना उससे भी बड़ा धर्म है। सच्चा धर्म केवल पूजा-आराधना तक सीमित न रहकर एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े रहने में है। जब हम एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ेंगे, तभी समाज सुदृढ़ होगा और जिनशासन की प्रभावना बढ़ेगी।

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