हैदराबाद (तेलंगाना), 03 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि आज सोशल मीडिया पर सैकड़ों मित्र बना लेना सरल है, लेकिन जीवन की कठिन परिस्थितियों में साथ निभाने वाला सच्चा मित्र अत्यंत दुर्लभ होता है। मित्रता केवल परिचय या साथ बैठने का नाम नहीं, बल्कि संवेदना, विश्वास व आत्मीयता का पवित्र बंधन है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सच्चा मित्र वह नहीं जो हर बात में हमारी हां-में-हां मिलाए, बल्कि वह है जो प्रेमपूर्वक हमारी कमियों का बोध कराकर उन्हें दूर करने की प्रेरणा दे। ऐसा ‘कल्याण मित्र‘ ही व्यक्ति को धर्म, सदाचार व आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर करता है।

हाथ और आंख के उदाहरण से समझाई आत्मीयता: गुरुदेव श्री ने हाथ और आंख का सुंदर उदाहरण देते हुए कहा कि जब हाथ को चोट लगती है तो आंखों से स्वतः आँसू निकल आते हैं और जब आंखों में आँसू आते हैं तो हाथ उन्हें पोंछने के लिए स्वतः आगे बढ़ जाता है। यही सच्ची मित्रता है, जहां एक का दुःख दूसरे की पीड़ा बन जाता है। गुरुदेव श्री ने प्रेरणा दी कि मित्र का चयन उसके संस्कार, चरित्र व व्यवहार को देखकर करना चाहिए। सच्ची मित्रता में स्वार्थ की जगह विश्वास, दिखावे की जगह समर्पण व केवल साथ चलने के बजाय जीवन को सही दिशा देने का साहस होता है।

मित्रों के बताए तीन प्रकार: प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने मित्रों के तीन प्रकार बताए। प्रथम, केवल सामने प्रशंसा और पीछे निंदा करने वाले “ताली वाले मित्र”। द्वितीय, धन, भोजन और सुविधाओं तक सीमित रहने वाले “थाली वाले मित्र”। तृतीय, केवल मौज-मस्ती और व्यसनों में साथ देने वाले “प्याली वाले मित्र”। उन्होंने कहा कि ऐसे संबंध अधिक समय तक टिक नहीं सकते, क्योंकि उनकी नींव स्वार्थ पर आधारित होती है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु, समाज के गणमान्यजन व विभिन्न समितियों के सदस्य उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने गुरुदेव श्री के वचनों को आत्मसात करते हुए श्रेष्ठ संगति अपनाने का संकल्प लिया।


