हैदराबाद (तेलंगाना), 30 जुलाई (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि चातुर्मास केवल चार महीनों का धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मजागरण, आत्मशुद्धि एवं आत्मचिंतन का स्वर्णिम अवसर है। जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप “मैं कौन हूं?” को नहीं पहचानता, तब तक धर्म की वास्तविक यात्रा प्रारंभ नहीं होती। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य नाम, परिवार, व्यवसाय व शरीर को ही अपना परिचय मान लेता है, जबकि ये सभी परिवर्तनशील हैं। वास्तविक स्वरूप आत्मा है, जो शरीर को संचालित करती है। इसलिए चातुर्मास का प्रथम संकल्प आत्मा को पहचानने व उसके कल्याण का होना चाहिए।

जीवन में आत्मा को दें प्रथम स्थान: गुरुदेव श्री ने कहा कि जीवन के चार आधार हैं—आत्मा, शरीर, परिवार व धन। आज की सबसे बड़ी भूल यह है कि धन को सर्वोच्च तथा आत्मा को अंतिम स्थान दे दिया गया है, जबकि प्राथमिकता क्रम में आत्मा प्रथम, फिर शरीर, परिवार व अंत में धन होना चाहिए। आत्मा के बिना इन सबका कोई अस्तित्व नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म में केवल भावुकता नहीं, बल्कि विवेक आवश्यक है। नवकार महामंत्र को जीवन में उतारकर ही आध्यात्मिक परिवर्तन संभव है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे जीवन में दो सूचियां बनाएं—’क्या करना है‘ और ‘क्या नहीं करना है‘। स्वाध्याय, तप, जप, आत्मचिंतन व संयम को अपनाएं तथा क्रोध, ईर्ष्या, निंदा व प्रमाद का त्याग करें। स्वयं को जानकर कर्म-निर्जरा करना ही चातुर्मास की सच्ची साधना है।

