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खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वर महाराज ने दिया आत्म परिवर्तन का संदेश, बोले-ईर्ष्या, क्रोध व लोभ छोड़कर मन को क्षमा, करुणा व संतोष से सजाएं

हैदराबाद (तेलंगाना), 30 जुलाई (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य दिनभर संसार से तो बहुत संवाद करता है, किन्तु स्वयं अपने मन से बात करने का समय शायद ही निकालता है। जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम कुछ क्षण रुककर स्वयं से पूछें कि हमारा मन कैसा है व हमें अपना मन कैसा बनाना है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारा घर, दुकान, तिजोरी या कमरा कभी खाली हो सकता है, किन्तु मन कभी खाली नहीं रहता। यदि इसमें अच्छे विचार नहीं बोए जाएं, तो बुरे विचार स्वतः स्थान बना लेते हैं। मन को जीत लेना ही सबसे बड़ी विजय है व यही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग है।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में मौजूद पुरूष वर्ग।

मन की शुद्धि व सकारात्मक संस्कार अत्यंत आवश्यक: गुरुदेव श्री ने कहा कि जिस प्रकार खाली खेत में यदि अन्न न बोया जाए तो उसमें घास-फूस उग जाती है, उसी प्रकार रिक्त मन में नकारात्मकता स्थान बना लेती है। इसलिए मन की नियमित जांच, शुद्धि व सकारात्मक संस्कार अत्यंत आवश्यक हैं। जीवन का प्रत्येक निर्णय मन से ही निकलता है। हम कहां जाएंगे, क्या बोलेंगे व किस प्रकार व्यवहार करेंगे, यह सब मन की स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए मन को ईर्ष्या, क्रोध व लोभ से नहीं, बल्कि क्षमा, करुणा, संतोष व सद्विचारों से सजाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि आज का मनुष्य सदैव इसके बाद क्या?” की दौड़ में लगा हुआ है। साधन तो बढ़ रहे हैं, किन्तु संतोष नहीं बढ़ रहा। वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मन को संतुलित, संयमित व संतुष्ट बनाने में है।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में मौजूद महिलाएं।

प्रसन्नचंद्र राजर्षि का दृष्टांत व आत्मकल्याण का संदेश: प्रवचन के दौरान गुरुदेव श्री ने जैन परंपरा के प्रसन्नचंद्र राजर्षि का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार कुछ क्षणों के अशुभ विचार उन्हें अधोगति की ओर ले जाने लगे थे, किन्तु जैसे ही उन्हें आत्मस्मरण हुआ—“मैं साधु हूं”, उनका दृष्टिकोण बदल गया व वही मन उन्हें आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले गया। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि मनुष्य का उत्थान व पतन किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि उसके अपने विचारों से निर्धारित होता है। आचार्य श्री ने प्रेरणा दी कि यदि हम प्रतिदिन कुछ समय अपने मन से संवाद करें, अपने विचारों का निरीक्षण करें व स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लें, तो जीवन की दिशा बदल सकती है।

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