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हैदराबाद में गूंजा जिनशासन की एकता का संदेश: आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी ने दिया परस्पर प्रेम व सहयोग का पाठ

हैदराबाद (तेलंगाना), 18 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि परमात्मा महावीर का जिनशासन अनादि काल से चला आ रहा है और देव, गुरु व धर्म की शरण मिलना हमारे विशेष पुण्य का परिणाम है। हमारी भावना ऐसी साधना करने की होनी चाहिए, जिससे आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सके। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जिनशासन एक विशाल वटवृक्ष के समान है, जिसकी मंदिरमार्गी, स्थानकवासी, तेरापंथी और दिगंबर जैसी अनेक शाखाएं व परंपराएं हैं। जिस प्रकार वटवृक्ष की डालियों में अहंकार या ईर्ष्या नहीं होती, उसी प्रकार विभिन्न परंपराओं में भी परस्पर प्रेम, सम्मान और सहयोग का भाव होना चाहिए।

निंदा से बचें, दूसरों की प्रगति में हों प्रसन्न: आचार्य श्री ने गच्छवाद को स्पष्ट करते हुए कहा कि अपने गच्छ का विकास करना गच्छवाद नहीं है, लेकिन दूसरे गच्छ की निंदा करना गच्छवाद है। किसी साधर्मिक भाई या दूसरे गच्छ को आगे बढ़ता देखकर हमें आनंदित होना चाहिए। सभी परंपराओं की जड़ एक ही हैभगवान महावीर की श्रमण परंपरा। उन्होंने आह्वान किया कि हमारा एक ही ध्येय होना चाहिएनिश्चय से आत्मा का कल्याण और व्यवहार से जिनशासन की उन्नति। जब सभी परंपराएं एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ेंगी, तभी जिनशासन का यह वटवृक्ष और अधिक सशक्त व समृद्ध बनेगा।

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