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जीवन के लिए हितकारी है धर्म साधना, मुनि प्रज्ञान सागर ने कहा- क्रोध व लोभ पर विजय पाने के लिए त्याग व संयम अपनाना जरूरी

केकड़ी, 11 जून (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य विनश्चय महाराज के सुशिष्य श्रमण मुनि प्रज्ञान सागर महाराज ने कहा कि अष्ट द्रव्य से भगवान की पूजा करना, निर्ग्रन्थ गुरु की उपासना करना, आहार दान, वैयावृत्ति व जिनवाणी वाचन करना श्रेष्ठ कर्म हैं। मनुष्य को हमेशा संयम के साथ जीवन यापन करते हुए अपनी कुल मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए व धर्म प्रभावना करनी चाहिए। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमिनाथ मन्दिर में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में क्रोध, लोभ, लालच, मोह व आकांक्षा पर विजय प्राप्त करने के लिए त्याग, संयम व धर्म को अपनाना चाहिए। जो व्यक्ति सच्चाई व धर्म का पालन करते हैं, देव भी हमेशा उनकी रक्षा करते है।

भक्तामर स्तोत्र की हुई व्याख्या: धर्म सभा में संघस्थ मुनि प्रसिद्ध सागर महाराज ने भक्तामर स्तोत्र की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि भव्य जीवों को हमेशा जिन पूजन का गुणगान करना चाहिए। जिन पूजन से मान व गर्व का परिहार होता है व देवगण का आश्रय प्राप्त किया जा सकता है। महापुरुष वे ही हैं जिनके स्वप्न में भी कभी मान, कषाय, क्रोध, लोभ व मोह प्रवेश नहीं कर पाते।

जिनेन्द्र प्रतिमाओं का किया जिनाभिषेक: समाज अध्यक्ष ज्ञान चंद जैन (ज्वैलर्स) व मंत्री कैलाश जैन (मावा वाले) ने बताया कि मुनिसंघ के सानिध्य में प्रातः जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेन्द्र अर्चना सहित कई धार्मिक क्रियाएं आनंदपूर्वक संपन्न हुई। मीडिया प्रभारी रमेश बंसल व पारस जैन ने बताया कि मध्यान्ह काल में रयणसारग्रंथ के माध्यम से श्रद्धालुओं ने गहराई से स्वाध्याय किया। वहीं सायं काल में मुनिसंघ के सानिध्य में महाआरती, भक्ति, शास्त्र सभा, स्वाध्याय व आनंद यात्रा का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए।

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