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सद्व्यवहार और विनम्रता से ही संभव है जीवन का कल्याण: आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

हैदराबाद (तेलंगाना), 07 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि परम शांति व परम समाधि का अनुभव तभी संभव है, जब हमारी सोच सकारात्मक, स्वभाव सरल, वाणी मधुर व हृदय पवित्र हो। मनुष्य की सोच, भाषा व व्यवहार का प्रभाव उसके पूरे परिवेश पर पड़ता है। एक व्यक्ति का सद्व्यवहार पूरे परिवार को स्वर्ग बना सकता है, जबकि दुर्व्यवहार उसे नरक बना देता है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने मनुष्य को तीन पन्नों की जीवन रूपी डायरी दी है। पहला पन्ना जन्मऔर तीसरा पन्ना मृत्युका है, जो पूर्वकर्मों के अनुसार लिखे जा चुके हैं। केवल बीच का दूसरा पन्ना कोरा है, जिसे लिखने का अधिकार हमें मिला है। इस पन्ने को क्रोध व ईर्ष्या के बजाय प्रेम, नम्रता, मधुरता व सद्व्यवहार से भरना चाहिए।

दूसरों के नहीं, अपने संस्कारों के अनुसार करें व्यवहार: आचार्यश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीराम ने वनवास देने वाली माता कैकेयी के चरणों में भी उसी श्रद्धा से वंदन किया, जिस श्रद्धा से माता कौशल्या के चरणों में करते थे; यही उनका भगवानत्व था। उन्होंने प्रेरणा दी कि हमारा व्यवहार सामने वाले के स्वभाव के अनुसार नहीं, बल्कि अपने संस्कारों के अनुसार होना चाहिए। बुरे व्यक्ति के साथ भी भलाई करना ही परमात्मा का मार्ग है। जिस प्रकार लोहा व सोना नरम होकर उपयोगी बनते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी विनम्रता व मधुर व्यवहार अपनाकर परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर होता है। आचार्य श्री के इस प्रेरणादायी संबोधन ने सभी श्रद्धालुओं को सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन सार्थक बनाने की प्रेरणा दी।

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