Homeसमाजअंतरंग रूपी आत्म-कल्याण की लक्ष्मी को समझना जरूरी: चातुर्मासिक धर्म सभा में...

अंतरंग रूपी आत्म-कल्याण की लक्ष्मी को समझना जरूरी: चातुर्मासिक धर्म सभा में छलका अध्यात्म का प्रवाह

केकड़ी, 05 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): आचार्य सुंदर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माताजी ने कहा कि प्रभु की शरण में एक इन्द्रिय जीव भी पुण्यशाली होने पर ही पहुंच पाता है। पुण्यशाली जीव को ही देव-शास्त्र-गुरु की शरण प्राप्त होती है। वे बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर में प्रवचन कर रही थी। उन्होंने कहा कि मोह-माया के अंधकार व धन के लोभ में पड़कर मनुष्य धर्म कार्य के प्रति अपना अनुराग कम करने लगता है। इंसान बाह्य रूपी धन-लक्ष्मी को तो ग्रहण कर लेता है, लेकिन अंतरंग रूपी आत्म-कल्याण की लक्ष्मी को समझ नहीं पाता। मन के स्थिर न होने से ध्यान धर्म के बजाय बाह्य क्रियाओं में अधिक भटकता है। जैसे-जैसे आत्म-शक्ति मजबूत होती है, वैसे-वैसे विषय-भोगों के प्रति आसक्ति घटने लगती है।

केकड़ी: माताजी के पाद प्रक्षालन करते लाभार्थी परिवार के सदस्य।

अंतरंग भावों में है असली सुंदरता: आचार्य कुंदकुंद स्वामी के विचारों का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। मनुष्य ने मंदिर व धर्म क्षेत्रों के तो खूब दर्शन कर लिए, लेकिन अपने निज रूपी मंदिर का दर्शन अभी तक नहीं कर पाया है। आत्मानुभूति होने पर ही निज आत्मा की पहचान होती है। असली सुंदरता चेहरे में नहीं, बल्कि अंतरंग भावों में होती है। कार्यक्रम के दौरान आर्यिका माताजी के सानिध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा व जिनेंद्र अर्चना सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं विधि-विधान से संपन्न हुईं। धर्मसभा से पूर्व सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा आचार्यों को अर्घ्य अर्पित किए गए।

ये बने सौभाग्यशाली: मीडिया प्रभारी रमेश बंसल ने बताया कि चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य टीकमचंद, विपिन कुमार, जितेंद्र कुमार (रामथला वाले) व विनोद कुमार, गणेश कुमार जैन (मेहरू कलां) को प्राप्त हुआ। मध्याह्न में स्वाध्याय व शंका समाधान का आयोजन हुआ। संध्या समय त्रिलोक सारग्रंथ के आधार पर धर्मोपदेश, महाआरती, भक्ति संगीत व प्रश्नोत्तरी के साथ आनंद यात्रा संपन्न हुई। धर्मसभा का संचालन ब्रह्मचारिणी कनक दीदी व पं. निकेत शास्त्री ने किया।

RELATED ARTICLES