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माणिक्य स्वामी आदिनाथ भगवान का ही स्वरूप: हैदराबाद में बोले आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वर— ‘इतिहास स्पष्ट है, अपनी कल्पनाओं से भ्रम न फैलाएं’

हैदराबाद (तेलंगाना), 22 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में मंगल प्रवचन करते हुए कुलपाकजी तीर्थ के इतिहास और माणिक्य स्वामी के स्वरूप पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला। शनिवार को प्रश्नोत्तरी सत्र के दौरान गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि कुलपाकजी तीर्थ में विराजमान माणिक्य स्वामी वास्तव में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ परमात्मा हैं, भगवान महावीर नहीं। आचार्य श्री ने कहा कि लगभग साढ़े सात सौ वर्ष पूर्व हुए आचार्य जिनप्रभसूरि महाराज ने प्राकृत भाषा में अनेक तीर्थों का प्राचीन इतिहास लिपिबद्ध किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कुलपाकजी तीर्थ के माणिक्य स्वामी को आदिनाथ परमात्मा बताया है। अतः माणिक्य स्वामीआदिनाथ भगवान के लिए प्रयुक्त एक विशेष नाम अथवा विशेषण है।

करना होगा इतिहास का सम्मान: इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि अष्टापद तीर्थ पर भरत चक्रवर्ती ने चौबीसों तीर्थंकरों की रत्नमयी प्रतिमाएं बनवाई थीं। उसी समय अपनी अंगूठी के नीलमणि रत्न से आदिनाथ भगवान की विशेष प्रतिमा बनाई गई, जिसे माणिक्य स्वामी कहा गया। यह प्रतिमा लंका से होती हुई राजा शंकरदेव द्वारा स्थापित की गई और वही स्थान आज कुलपाकजी तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। गुरुदेव ने कहा कि जहां इतिहास और प्रमाण स्पष्ट हैं, वहां अपनी कल्पनाओं से भ्रम पैदा करने के बजाय इतिहास का सम्मान करना चाहिए। धर्म में आस्था के साथ-साथ प्रामाणिकता और सही समझ का होना भी बेहद आवश्यक है।

भावपूर्ण साधना ही आत्मा की सच्ची यात्रा: साधना के विषय पर मार्गदर्शन देते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का मूल आधार भावहै। माला फेरते समय केवल संख्या पूरी करने का बोझ नहीं होना चाहिए, बल्कि मंत्र के प्रति आत्मीयता और आनंद होना चाहिए। सामायिक में मन न लगे तब भी उसे छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि निरंतर अभ्यास से ही मन रमेगा। कर्मों की निर्जरा केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि शुद्ध भावों से होती है। प्रवचन के उपरांत मुनि विरक्तप्रभसागर म.सा. ने सभी तपस्वियों की सुख-शाता पूछी और आगामी दिवस के प्रवचन का विषय मेरे भाई, तुझी में, मेरी दुनिया समाईघोषित किया।

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