Monday, October 5, 2026
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अतीत केवल गौरव करने के लिए नहीं, वर्तमान को दिशा देने वाली प्रेरणा है: आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में प्रवचन करते खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी महाराज।

हैदराबाद (तेलंगाना), 20 अगस्त (आदित्य न्यूज नेटवर्क): खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि समय-समय पर अपने अतीत के पृष्ठों को खोलकर देखना चाहिए ताकि यह ज्ञात हो सके कि जड़ें कितनी मजबूत हैं। भगवान महावीर ने मानव समाज को जातियों में विभाजित नहीं किया, बल्कि मानव जाति को एक बताया है। जिनशासन की जाजम पर हर वह व्यक्ति बैठने का अधिकारी है, जो परमात्मा के धर्म और आदेशों को स्वीकार करता है। वे श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक सभा में ‘अतीत की विरासत, वर्तमान की जिम्मेदारी’ विषय पर मंगल प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने ओसिया की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि आचार्य भगवंत की साधना व अहिंसा की देशना से राजा सहित हजारों लोगों ने जैन धर्म स्वीकार किया, जिससे ओसवाल समाज की नींव पड़ी। यह अनेक आचार्यों की तपस्या व धर्मप्रभावना का परिणाम था।

हैदराबाद: कारवान दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में उपस्थित साध्वी मंडल।

पूर्वजों ने पेश की उदारता की मिसाल: पूर्वजों के योगदान की सराहना करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि उन्होंने धन को धर्म, समाज व मानवसेवा में समर्पित करना सीखा। खेमा देदानी जैसे श्रावकों ने अकाल के समय भोजन व्यवस्था का भार उठाकर उदारता की मिसाल पेश की थी। उन्होंने सादगी और कंजूसी के अंतर को स्पष्ट करते हुए पूर्वजों के आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान किया। अंत में आचार्य श्री ने कहा कि पंथ और गच्छ अपनी जगह हैं, लेकिन सामाजिक स्तर पर संपूर्ण जैन समाज एक परिवार है। पूर्वजों की उदारता, साधना, सादगी व एकता को अपनाकर आने वाली पीढ़ी को संस्कारित विरासत सौंपना ही वर्तमान की वास्तविक जिम्मेदारी है।